दुल्हनिया
// दिनेश एल० जैहिंद
इन मर्दों को कौन समझाए
दुल्हनिया के पल्ले मत पड़ना !
पड़कर बहुरिया के संगत में
अपना जीवन नर्क मत करना !!
दुल्हनिया की भूख तुम्हारी
तुम्हें भूखे-नंगे कहीं सुला देगी !
कोल्हू के बैल के जैसे भैया
भर-भर आँसू तुम्हें रुला देगी !!
पति परमेश्वर का युग नहीं
नारी-ईश्वर का है ये युग आया !
खूब सताए तुम देवियों को
अब सहो उनकी ये धूप-छाया !!
दुल्हनिया के फेरे में जो रहे
बंदर कभी छछून्दर बना देगी !
नहीं बचोगे त्रिया-चरित्र से
"ताता-थैया" नाच नचा देगी !!
दुल्हनिया की जी-हजुरी में
मैं दिन-रात लगा रहता हूँ भैया !
सोते पैर दबाऊँ, जगते ही मैं
पेश सामने चाय करता हूँ भैया !!
मैके जाने की धमकी के संग
मरने की धमकी भी सुनता हूँ जी !
गल-फाँसी की धमकी सुनके
जेल जाने से अब मैं डरता हूँ जी !!
शादी का लड्डू बड़ा अजीब
खाए सो भी पछताए जग में जी !
ना खाए ये लड्डू जो भी वो
तिल-तिल पछताए जीवन में जी !!
ये दुल्हनिया की चाहत कैसी
जिया हर पल प्रिये-प्रिये रटता है !
प्रियतमा बिनु रहा जाता नहीं
जीवन उसी संग दुख में कटता है !!
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