Thursday, April 13, 2023

दुल्हनिया



दुल्हनिया

// दिनेश एल० जैहिंद



इन मर्दों को कौन समझाए

दुल्हनिया के पल्ले मत पड़ना !

पड़कर बहुरिया के संगत में

अपना जीवन नर्क मत करना !!


दुल्हनिया की भूख तुम्हारी

तुम्हें भूखे-नंगे कहीं सुला देगी !

कोल्हू के बैल के जैसे भैया

भर-भर आँसू तुम्हें रुला देगी !!


पति परमेश्वर का युग नहीं 

नारी-ईश्वर का है ये युग आया !

खूब सताए तुम देवियों को

अब सहो उनकी ये धूप-छाया !!


दुल्हनिया के फेरे में जो रहे 

बंदर कभी छछून्दर बना देगी !

नहीं बचोगे त्रिया-चरित्र से

"ताता-थैया" नाच नचा देगी !!


दुल्हनिया की जी-हजुरी में

मैं दिन-रात लगा रहता हूँ भैया !

सोते पैर दबाऊँ, जगते ही मैं

पेश सामने चाय करता हूँ भैया !!


मैके जाने की धमकी के संग

मरने की धमकी भी सुनता हूँ जी !

गल-फाँसी की धमकी सुनके

जेल जाने से अब मैं डरता हूँ जी !!


शादी का लड्डू बड़ा अजीब

खाए सो भी पछताए जग में जी !

ना खाए ये लड्डू जो भी वो

तिल-तिल पछताए जीवन में जी !!


ये दुल्हनिया की चाहत कैसी

जिया हर पल प्रिये-प्रिये रटता है !

प्रियतमा बिनु रहा जाता नहीं

जीवन उसी संग दुख में कटता है !!


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