रथ के दो पहिये
//दिनेश एल० "जैहिंद"
देख डरो ना डराओ किसी को,
मिलके रहो प्रेम कहते इसी को।
ना पत्नी अब छिपकली से डरे,
ना पति कहाँ बेलन से डर करे।
सब झूठ - मूठ का दिखावा है,
ये जग तो बस एक छलावा है।
ना तुम तो बनो बटेर सुन प्रिये,
ना हम बनें बर्बर शेर सुन प्रिये।
ना डराओ पत्नी को साथियो,
ना सताओ पति को गृहिणियो।
ये संसार, इसकी सांसारिकता,
अपने हृदय में भाव लो इसका।
कब मैं तुमसे श्रेष्ठ था वो प्रिये,
देख तेरी अँखियों में हम जिये।
तुम अपना फर्ज निभाती चलो,
हम कर्म अपना करते रहें सुनो।
जो झुकता है वहीं जिंदा रहता,
जो अकड़ता,वो जल में बहता।
हम हैं रथ के दो पहिये कब से,
बिन पहिये के कब चला रथ ये।
गृहस्थी के बोझ लाद कर चलें,
आओ, ईश के आदेश पर चलें।
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